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ईद की मुबारक़बाद

आज कार्यालय समाप्त होने के समय वरीय सहकर्मियों ने राय कि कल ईद है। चलना है ना 'J' भाई के घर। सब ने एक दूसरे के चेहरे देखे और ज़ुबान बोल उठी- हाँ, हाँ। क्यों नहीं। कितने बजे?
तभी एक आवाज़ गूंजी - हम क्यों जाएँ? क्या वह आता है, हमारे यहाँ होली पर? सन्नाटा छा गया। जैसे किसी ने ज़ोरदार तमाचा मरा हो। "हाँ, मैं कह रहा हूँ। क्यों जाएँ हम? सिर्फ खाने के लिए क्या? घर में मटन, सेवई नहीं बनती है? वो भी वृहस्पतिवार को?"
आवाज़ रॉब और हिम्मत से जवाब में- हम खाने थोड़े ही जाते हैं! गले मिलने और इत्र की खुशबु लेने जातें हैं। और यह दोनों हमारे घर में नहीं मिलता। जोरदार ठहाका।

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